संदेश

ज्ञान की बात

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 हनुमान जी और अंगद जी दोनों ही समुद्र लाँघने में सक्षम थे, तो पहले हनुमान जी फिर लंका क्यों गए? अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥ अंगद जी बुद्धि और बल में बाली के समान ही थे। समुद्र के उस पार जाना भी उनके लिए बिल्कुल सरल था। किन्तु वह कहते हैं कि लौटने में मुझे संशय है। कौन सा संशय था लौटने में? बालि का पुत्र अंगद और रावण का पुत्र अक्षय कुमार दोनों एक ही गुरु के यहाँ शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। अंगद बहुत ही बलशाली थे और थोड़े से शैतान भी थे। वो प्रायः अक्षय कुमार को थप्पड़ मार देते थे जिससे की वह मूर्छित हो जाता था। अक्षय कुमार हर बार रोता हुआ गुरुजी के पास जाता और अंगद जी की शिकायत करता, एक दिन गुरुजी ने क्रोधित होकर अंगद को श्राप दे दिया कि अब यदि अक्षय कुमार पर तुमने हाथ उठाया तो तुम उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। अंगद जी को यही संशय था कि कहीं लंका में उनका सामना अक्षय कुमार से हो गया तो श्राप के कारण गड़बड़ हो सकती है, इसलिए उन्होंने पहले हनुमान जी से जाने को कहा। यह बात रावण भी जानता था, इसलिए जब राक्षसों ने रावण को बताया बड़ा भारी वानर आया है और अशोक वाटि...

1972 से 2026

 फ्री होकर प्यार से पढना आनंद आएगा            उल्टी यात्रा 2021 से 1970 के दशक अर्थात बचपन की तरफ़ जो 50 को पार कर गये हैं या करीब हैं उनके लिए य ह खास है🙏🏻🙏🏻🙏🏻 मेरा मानना है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है हमारे बाद की किसी पीढ़ी को "शायद ही " इतने बदलाव देख पाना संभव हो 🤔🤔🤔 हम वो आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखे हैं। बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और "वर्चुअल मीटिंग जैसी" असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को सम्भव होते हुए देखा है। 🙏🏻 हम वो पीढ़ी हैं   जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं हैं। ज़मीन पर बैठकर खाना खाया है। प्लेट में डाल डाल कर चाय पी है। 🙏 हम  वो " लोग " हैं ?*l जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल , खेले हैं । 🙏हम आखरी पीढ़ी  के वो लोग हैं ?  जिन्होंने चांदनी रात में डीबरी, लालटेन या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है...

1990 ka जमाना

 हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी , *पहला चरण कैंची और दूसरा चरण डंडा तीसरा चरण गद्दी.......* तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पापा या चाचा चलाया करते थे.  *तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।* *"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे*। और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और *"क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है* । *आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था*। हमने ना जाने कितने दफे अपने *घुटने और मुंह तोड़वाए है* और गज़ब की बात ये है कि *तब दर्द भी नही होता था,* गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते ...

2025 विदाई समारोह

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 2025  आज 2025 विदा ले रहा है। यह वर्ष केवल समय का एक पन्ना नहीं, बल्कि जीवन की पुस्तक का एक ऐसा अध्याय रहा, जिसने बहुत कुछ अकल्पनीय, अवर्णनीय और अविस्मरणीय दिया। जो सोचा भी नहीं था, वह मिला। जो चाहा नहीं था, उसने भी कुछ सिखाया। हर परिस्थिति में परमात्मा की विशेष कृपा स्पष्ट रूप से अनुभव होती रही। कभी संघर्ष आया, कभी समाधान। कभी मौन रहा, कभी कृतज्ञता के आँसू। पर हर मोड़ पर यह अनुभूति बनी रही कि हम अकेले नहीं हैं — कोई अदृश्य हाथ निरंतर मार्गदर्शन कर रहा है। इस वर्ष ने विश्वास को गहराया, धैर्य को परिपक्व किया और जीवन को देखने की दृष्टि को और पवित्र बनाया। इसके लिए ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद 🙏 अब जब हम नए वर्ष की दहलीज़ पर खड़े हैं, तो मन से यही प्रार्थना निकलती है— 🌼 आने वाला वर्ष सबके लिए मंगलमय हो 🌼 हर घर में स्वास्थ्य, शांति और सद्भाव हो 🌼 हर मन में आशा, विश्वास और करुणा का वास हो 🌼 और जीवन का हर कदम सत्पथ की ओर बढ़े 2025, तुम्हें ससम्मान विदा। जो दिया, उसके लिए कृतज्ञता। जो सिखाया, उसके लिए नमन। ईश्वर सबका कल्याण करें। सर्वे भवन्तु सुखिनः। नया वर्ष शुभ हो।  परमानन...
यदि आप अपने ज्ञान को बहुमूल्य तथा उपयोगी बनाना चाहते है तो अपनी बुद्धि का व्दार प्रसन्नता से खोल दीजिए  प्रसन्नचित व्यक्ति जहा कही भी जाता है वहा अपना प्रभाव छोड़ आताहै

15 8 2025

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परानी यादे

 जब हम स्कूल में पढ़ते थे.......उस स्कूली दौर में होल्डर पेन का जिसे स्याही में डुबोकर चलाया जाता था...उसका अंतिम चरण था और निब वाले फाउंटेन पेन का चलन जोरों पर था.......!(बॉल पेन भी था जिसे डांट पेन भी कहा जाता था उसे उपयोग करनी की इजाजत हमें स्कूल में नहीं थी...पिटाई हो जाती थी....) तब कैमलिन की स्याही प्रायः हर घर में मिल ही जाती थी......कोई कोई टिकिया से स्याही बनाकर भी उपयोग करता था और बुक स्टाल पर शीशी में स्याही भर कर रखी होती थी 5 पैसा दो और ड्रापर से खुद ही डाल लो ये भी सिस्टम था.........जिन्होंने भी पैन में स्याही डाली होगी वो ड्रॉपर के महत्व से  भली भांति परिचित होंगे.......!  कुछ लोग ड्रापर का उपयोग कान में तेल डालने में भी करते थे....... महीने में दो-तीन बार निब पैन को खोलकर उसे गरम पानी में डालकर उसकी सर्विसिंग भी की जाती थी और  लगभग सभी को लगता था की निब को उल्टा कर के लिखने से हैंडराइटिंग बड़ी सुन्दर बनती है....... सामने के जेब मे पेन टांगते थे और कभी कभी स्याही लीक होकर सामने शर्ट नीली कर देती थी जिसे हम पौंक देना कहते थे......कापी में पौंक देने पर हम...