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15 8 2025

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परानी यादे

 जब हम स्कूल में पढ़ते थे.......उस स्कूली दौर में होल्डर पेन का जिसे स्याही में डुबोकर चलाया जाता था...उसका अंतिम चरण था और निब वाले फाउंटेन पेन का चलन जोरों पर था.......!(बॉल पेन भी था जिसे डांट पेन भी कहा जाता था उसे उपयोग करनी की इजाजत हमें स्कूल में नहीं थी...पिटाई हो जाती थी....) तब कैमलिन की स्याही प्रायः हर घर में मिल ही जाती थी......कोई कोई टिकिया से स्याही बनाकर भी उपयोग करता था और बुक स्टाल पर शीशी में स्याही भर कर रखी होती थी 5 पैसा दो और ड्रापर से खुद ही डाल लो ये भी सिस्टम था.........जिन्होंने भी पैन में स्याही डाली होगी वो ड्रॉपर के महत्व से  भली भांति परिचित होंगे.......!  कुछ लोग ड्रापर का उपयोग कान में तेल डालने में भी करते थे....... महीने में दो-तीन बार निब पैन को खोलकर उसे गरम पानी में डालकर उसकी सर्विसिंग भी की जाती थी और  लगभग सभी को लगता था की निब को उल्टा कर के लिखने से हैंडराइटिंग बड़ी सुन्दर बनती है....... सामने के जेब मे पेन टांगते थे और कभी कभी स्याही लीक होकर सामने शर्ट नीली कर देती थी जिसे हम पौंक देना कहते थे......कापी में पौंक देने पर हम...