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कभी सोचा आप ने

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 दीपावली के दिन सूरन की सब्जी बनती है,,,सूरन को जिमीकन्द (कहीं कहीं ओल) भी बोलते हैं,, आजकल तो मार्केट में हाईब्रीड सूरन आ गया है,, कभी-२ देशी वाला सूरन भी मिल जाता है,,, बचपन में ये सब्जी फूटी आँख भी नही सुहाती थी,, लेकिन चूँकि बनती ही यही थी तो झख मारकर खाना पड़ता ही था,,तब मै सोचता था कि पापा लोग कितने कंजूस हैं जो आज त्यौहार के दिन भी ये खुजली वाली सब्जी खिला रहे हैं,,, दादी बोलती थी आज के दिन जो सूरन न खायेगा अगले जन्म में छछुंदर जन्म लेगा,, यही सोच कर अनवरत खाये जा रहे है कि छछुंदर न बन जाये😂😂 बड़े हुए तब सूरन की उपयोगिता समझ में आई,, सब्जियो में सूरन ही एक ऐसी सब्जी है जिसमें फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है,, ऐसी मान्यता है और अब तो मेडिकल साइंस ने भी मान लिया है कि इस एक दिन यदि हम देशी सूरन की सब्जी खा ले तो स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पूरे साल फास्फोरस की कमी नही होगी,, मुझे नही पता कि ये परंपरा कब से चल रही है लेकिन सोचीए तो सही कि हमारे लोक मान्यताओं में भी वैज्ञानिकता छुपी हुई होती थी ,,, धन्य पूर्वज हमारे जिन्होंने विज्ञान को परम्पराओं, रीतियों, रिवाजों, संस्क...

वेभी क्या दिन थे

वै भी क्या दिन थे जब हम लोग बचपन में पिता जी के साथ  साइकिल पर बैठकर दिवाली से चार रोज पहले  दिवाली का  पडाके लाने जाते थे उस जमाने  मे 70 80 रुपए इतना सारा पडाके लाते थे हम सब 7 दिनों  तक जलाते थे

बहुत ही सुंदर

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आप को नही मालुम

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हंसता हुआ चेहरा खिले हुए फूल बहुत ही सुहाने लगते हैं इसलिए हमेशा हंसते मुस्कुराते रहिए जीवन का आनंद लीजि  

Samy Ki Soch

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 इसके भी अपने दिन थे। समय की मार से कोई नहीं बच पाया। समय पर आप नहीं बदलिएगा तो समय आपको बदल देगा।