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पुरानी विरासत

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  #विरसत              हल खींचते समय  यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था  तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके  बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था  ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके,  यह आम चलन था। हमनें यह सारी बातें बचपन में  स्वयं अपनी आंखों से देखी हुई हैं।  जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना  उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी  जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं,  यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा । उस जमाने का देशी घी  यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं  तो इतना शुद्ध होता था कि   2 हजार रुपये किलो तक बिक सकता है। और उस देसी घी को  किसान विशेष कार्य के दिनों में  हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी  अपने बैलों को पिलाता था ।  टटीरी नामक पक्षी अपने अंडे  खुले खेत की मिट्टी पर देती है  और उनको सेती है। हल चलाते समय  यदि सामने कहीं कोई टटीरी चिल्लाती मिलती थी  तो किसान इशारा समझ जाता था  और उस अंडे वाली जगह को...

रामचरित मानस

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 सुप्रभात मंगलमय हो सियावर राजा रामचंद्र की जय पवनसुत हनुमान जी महराज की जय                   अस कहि करत दंडवत देखा,                       तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा,    भुज बिसाल गहि हृदय लगावा॥         अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी,              बोले बचन भगत भयहारी॥ कहुं लंकेश सहित परिवारा, कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ खल मंडली बसहुं दिनु राती, सखा धरम निबहइ केहि भांती॥                                मैं जानउं तुम्हारि सब रीती,                                    अति नय निपुन न भाव अनीती॥                                       बरु भल बास नर...