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नर्मदा की महिमा

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 मैं नर्मदा हूं..... मैं नर्मदा हूं। जब गंगा नहीं थी , तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था , तभी भी मै थी। मेरे किनारों पर नागर सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। पहले मेरे तट पर उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था। मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों मे मार्कंडेय, कपिल, भृगु , जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे । यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था । ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए।  इन्हीं ऋषियों में से एक ने मेरा नाम रखा, " रेवा "। रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम "रेवा" रखा। एक अन्य ऋषि ने मेरा नाम "नर्मदा " रखा ।"नर्म" यानी आनंद । आनंद देनेवाली नदी। मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूं । गंगा के बाद मेरा ही महत्व है । पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं । स्कंदपुराण का "रेवाखंड " तो पूरा का...

बदलता समय

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फ्री होकर प्यार से पढना आनंद आएगा            उल्टी यात्रा 2021 से 1970 के दशक अर्थात बचपन की तरफ़ जो 50 को पार कर गये हैं या करीब हैं उनके लिए य ह खास है🙏🏻🙏🏻🙏🏻 मेरा मानना है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है हमारे बाद की किसी पीढ़ी को "शायद ही " इतने बदलाव देख पाना संभव हो 🤔🤔🤔 हम वो आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखे हैं। बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और "वर्चुअल मीटिंग जैसी" असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को सम्भव होते हुए देखा है। 🙏🏻 हम वो पीढ़ी हैं   जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं हैं। ज़मीन पर बैठकर खाना खाया है। प्लेट में डाल डाल कर चाय पी है। 🙏 हम  वो " लोग " हैं ?*l जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल , खेले हैं । 🙏हम आखरी पीढ़ी  के वो लोग हैं ?  जिन्होंने चांदनी रात में डीबरी, लालटेन या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और दि...

सन 2023

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 अंग्रेजी कलेण्डर के अनुसार वर्ष 2023 आप सभी को खुशहाली,समृद्धि, शांति,आरोग्यता,सच्ची मित्रता,एवं भगवत भक्ति प्रदायक हो! यह वर्ष राष्ट्र के लिए मंगलमय हो परमपिता परमेश्वर से यही मेरी प्रार्थना है !🙏 परमानन्द  चतुर्वेदी!🚩

गऊ धन की महीमा

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  Sb 🌹 गाय व भैंस के दूध में अंतर जो बहुत कम लोग जानते हैं --------------------------------------- भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खा जायें वह नहीं बचायेगी, जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी, परन्तु जीते जी बच्चे पर आँच नही आने देगी। इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है। ◆ भैंस को गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी,, पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी उसे स्वच्छता प्रिय है। ◆ भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी याददास्त जीरो है। गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो। वह घर का रास्ता जानती है,आ जायेगी। गाय के दूध में स्मृति तेज है। ◆ दस भैंसों को बाँधकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी माँ को नहीं पहचान सकता, जबकि गौशालाओं में दिन भर गाय व बछड़े अलग-अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका माता से मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी माँ को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गाय दूध की याददास्त। ◆ जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध...

ओ भी क्या दिन था

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 शादी में डोंगा-सिस्टम बफेट सिस्टम खाने में वो आनंद कहाँ जो पंगत में आता था.. - पहले जगह रोकना... अब बिना फटे पत्तल डॉनों को छांटना! उतारे हुए जूते चप्पलों पर नजर रखना...! - फिर पत्तल पे ग्लास रखकर उसे उड़ने से रोकना! - नमक रखने वाले को जगह बताना यहां रखो नमक.. साथ में सब्जी देने वाले को गाइड करना हिला के दे या तरी तरी देना! - मुँह बड़े से टूक से भरा है तो उँगलियों से इशारे करते हुए दो-दो लड्डू और गुलाब जामुन रखवा लेना.. साथ में पूड़ियाँ गरम गरम और छाँट-छाँट के रखवाना!. - पीछे वाली पंगत में झांक के देखना क्या क्या आ गया और अपने इधर और क्या बाकी है.. जो बाकी है उसके लिए आवाज लगाना! - बगल में बैठे फूफाजी के पत्तल में जबरदस्ती पूडी रखवाना..  - रायते वाले को दूर से आता देख फटाफट रायते को पी डालना! - पहले वाली पंगत कितनी देर में उठेगी। उसके हिसाब से बैठने की पोजीशन बना लेना और आखिर में पानी वाले को खोजना। - खाने के बाद अगर शंका हो की पेट अभी भी नहीं भरा या कोई आइटम छूट गया तो अगली पंक्ति के कोने में फिर से बैठ जाना!👏👏

भारतीय कि प्राचीन वैदिक सभ्यता

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 छठ....     जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आँचल में फल ले कर निकलती हैं तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, "देखो! तुम्हारे असँख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है, हम सनातन हैं, हम भारत हैं। हम तबसे हैं जबसे तुम हो, और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।"       जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सिपुलि में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बन कर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं। स्त्री का सबसे भव्य, सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है। इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा। कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी स्त्री को, आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी।       छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं, एक देवता को अर्घ देते हैं, और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं। धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उन्ह...

कभी सोचा आप ने

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 दीपावली के दिन सूरन की सब्जी बनती है,,,सूरन को जिमीकन्द (कहीं कहीं ओल) भी बोलते हैं,, आजकल तो मार्केट में हाईब्रीड सूरन आ गया है,, कभी-२ देशी वाला सूरन भी मिल जाता है,,, बचपन में ये सब्जी फूटी आँख भी नही सुहाती थी,, लेकिन चूँकि बनती ही यही थी तो झख मारकर खाना पड़ता ही था,,तब मै सोचता था कि पापा लोग कितने कंजूस हैं जो आज त्यौहार के दिन भी ये खुजली वाली सब्जी खिला रहे हैं,,, दादी बोलती थी आज के दिन जो सूरन न खायेगा अगले जन्म में छछुंदर जन्म लेगा,, यही सोच कर अनवरत खाये जा रहे है कि छछुंदर न बन जाये😂😂 बड़े हुए तब सूरन की उपयोगिता समझ में आई,, सब्जियो में सूरन ही एक ऐसी सब्जी है जिसमें फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है,, ऐसी मान्यता है और अब तो मेडिकल साइंस ने भी मान लिया है कि इस एक दिन यदि हम देशी सूरन की सब्जी खा ले तो स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पूरे साल फास्फोरस की कमी नही होगी,, मुझे नही पता कि ये परंपरा कब से चल रही है लेकिन सोचीए तो सही कि हमारे लोक मान्यताओं में भी वैज्ञानिकता छुपी हुई होती थी ,,, धन्य पूर्वज हमारे जिन्होंने विज्ञान को परम्पराओं, रीतियों, रिवाजों, संस्क...