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15 8 2025

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परानी यादे

 जब हम स्कूल में पढ़ते थे.......उस स्कूली दौर में होल्डर पेन का जिसे स्याही में डुबोकर चलाया जाता था...उसका अंतिम चरण था और निब वाले फाउंटेन पेन का चलन जोरों पर था.......!(बॉल पेन भी था जिसे डांट पेन भी कहा जाता था उसे उपयोग करनी की इजाजत हमें स्कूल में नहीं थी...पिटाई हो जाती थी....) तब कैमलिन की स्याही प्रायः हर घर में मिल ही जाती थी......कोई कोई टिकिया से स्याही बनाकर भी उपयोग करता था और बुक स्टाल पर शीशी में स्याही भर कर रखी होती थी 5 पैसा दो और ड्रापर से खुद ही डाल लो ये भी सिस्टम था.........जिन्होंने भी पैन में स्याही डाली होगी वो ड्रॉपर के महत्व से  भली भांति परिचित होंगे.......!  कुछ लोग ड्रापर का उपयोग कान में तेल डालने में भी करते थे....... महीने में दो-तीन बार निब पैन को खोलकर उसे गरम पानी में डालकर उसकी सर्विसिंग भी की जाती थी और  लगभग सभी को लगता था की निब को उल्टा कर के लिखने से हैंडराइटिंग बड़ी सुन्दर बनती है....... सामने के जेब मे पेन टांगते थे और कभी कभी स्याही लीक होकर सामने शर्ट नीली कर देती थी जिसे हम पौंक देना कहते थे......कापी में पौंक देने पर हम...

🚩 ब्राह्मण🚩

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ब्राह्मण में ऐसा क्या है कि सारी दुनिया ब्राह्मण के पीछे पड़ी है। इसका उत्तर इस प्रकार है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि भगवान श्री राम जी ने श्री परशुराम जी से कहा कि  → "देव  एक  गुन  धनुष  हमारे।  नौ गुन  परम  पुनीत तुम्हारे।।" हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में परम पवित्र 9 गुण है- ब्राह्मण_के_नौ_गुण :- रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः। दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।। ● रिजुः = सरल हो, ● तपस्वी = तप करनेवाला हो, ● संतोषी= मेहनत की कमाई पर  सन्तुष्ट, रहनेवाला हो, ● क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो, ● जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखनेवाला हो, ● दाता= दान करनेवाला हो, ● शूर = बहादुर हो, ● दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो, ● ब्रह्मज्ञानी,         श्रीमद् भगवत गीता के 18वें अध्याय के 42श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण इस प्रकार बताए गये हैं- " शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्...
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जय श्री कृष्ण

पुरानी विरासत

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  #विरसत              हल खींचते समय  यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था  तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके  बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था  ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके,  यह आम चलन था। हमनें यह सारी बातें बचपन में  स्वयं अपनी आंखों से देखी हुई हैं।  जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना  उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी  जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं,  यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा । उस जमाने का देशी घी  यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं  तो इतना शुद्ध होता था कि   2 हजार रुपये किलो तक बिक सकता है। और उस देसी घी को  किसान विशेष कार्य के दिनों में  हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी  अपने बैलों को पिलाता था ।  टटीरी नामक पक्षी अपने अंडे  खुले खेत की मिट्टी पर देती है  और उनको सेती है। हल चलाते समय  यदि सामने कहीं कोई टटीरी चिल्लाती मिलती थी  तो किसान इशारा समझ जाता था  और उस अंडे वाली जगह को...

रामचरित मानस

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 सुप्रभात मंगलमय हो सियावर राजा रामचंद्र की जय पवनसुत हनुमान जी महराज की जय                   अस कहि करत दंडवत देखा,                       तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा,    भुज बिसाल गहि हृदय लगावा॥         अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी,              बोले बचन भगत भयहारी॥ कहुं लंकेश सहित परिवारा, कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ खल मंडली बसहुं दिनु राती, सखा धरम निबहइ केहि भांती॥                                मैं जानउं तुम्हारि सब रीती,                                    अति नय निपुन न भाव अनीती॥                                       बरु भल बास नर...