जय श्रीराम सीताराम राम मन के हारे हार
संसार मे अड़चन और परेशानी न हो
यह कैसे हो सकता है
सप्ताह मे एक दिन रविवार का भी तो आएगा जो झुला ऊपर जाता है ओ नीचे भी आता है
वही हाल जीवन रूपी घुले का है प्राकृतिक नियम ही ऐसा है कि जिन्दगी मे जितना सुख दुख मिलना है मिलता ही है मिलेगा भी क्यो नही ! यह आप के सोच पर निर्भर है टेण्डर मे जो भरोस वही तो खुलेगा
जैसे सुबह बाद रात वैसे ही मीठे के साथ नमकीन जरूरी है
सुख के साथ दुख का होना भी ज़रूरी है
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें