जो बीत गए

 छोटे छोटे आले हुआ करते थे

सुख के कुछ निवाले हुआ करते थे

कच्चे मकानों में बसती थी ज़िन्दगी 

दिन बहुत मतवाले हुआ करते थे


सुबह के सूरज में भी बड़ी रौनक थी 

सर्दी की धूप भी जैसे कनक थी

अपनापन हर दिल में था 

भले ही चेहरे गोरे और काले हुआ करते थे 


मेहनत की रोटी में स्वाद था

गरीबी में भी घर आबाद था

पसीने में भी सुकूँ की ठंडक थी 

भले ही पैरों में छाले हुआ करते थे 


हर खंडहर में प्रेम का निशान था

हर प्रेम में वफ़ा का सामान था

हर ईमारत में प्यार का पैगाम था 

भले ही छतों पे लगे जाले हुआ करते थे


चिट्ठियों में यादों की खुशबु थी 

ख़ुशी हर रिश्ते से रूबरू थी 

सुलझे सरल से लोग थे

नहीं फ़ितरत में गड़बड़झाले हुआ करते थे

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